Sunday, February 26, 2017

रात रौशनी

अक्सर
मैं जब जुगनुओं से बातें करता हूँ
तुम्हारा जिक्र निकल आता है
और रात रौशनी का उर्स हो जाती है

Saturday, February 25, 2017

आज दिल फिर से बगावत पर उतर आया है

आज
दिल फिर से बगावत पर उतर आया है
और ज़िद पकड़ ली है
कि चाँद की पेशनी पर सितारे सजायेगा

बावला
बड़ी देर तक आसमान को घूरता रहा
और दूरियों से राकाबत पर उतर आया
अगर उसके हाथों में कहीं से कोई सुआ पढ़ जाता
तो अपने शिद्दत की डोर से
उफ़क़ को ही सी डालता

अब उसे कैसे कोई समझाए
की तकदीर के साहिल
सील तो सकते हैं
मिल नहीं सकते

Saturday, January 31, 2015

sunset sonnet 1



life sometimes is such a whore
sinks you at the hem of shore
what hind and what fore
tides tides tides more
brine seeping into core
what venom did it bore
guts grind, stomach roar
slime, puke oh! what a gore
who knows what else is in store
life sometimes is such a whore

Saturday, December 20, 2014

कभी घुल जाउँगा मैं

कभी
घुल जाउँगा
मैं
रात कि शबनम में
और तुमको ना खबर होगी
सुबह जागोगो
तो सूरज बदनुमा सा होगा
और रात की सीलन तुम्हारी साँसों में महकेगी
गेसुओं में उलझे ख्याल तुम्हारी उंगलियों को बाँध लेंगे
और तुम्हारी नज़र रोशनी से सवालात करेगी
दर
दीवारें
दरीचें
दफ्न कर देंगी
दरम्यान
और छत पर रेंगते मरासिम
तुम्हारी आँखों में उतर जाएँगे
पलकों पर पतझड ठहर जाएगा
मुजंमिद साँसों से पेशतर
धङकने रंज करेगी
जिंदगी के इसरार पर
ना दर्द होगा
ना सुकून
बस वक्त
पिघल पिघल कर
मोम सा बहता रहेगा
तकिए की सलवटें चुभेंगी
रूह पर खराशें बन कर उतर जाएंगी
रात पसरेगी बिस्तर पर बन कर रकीब
नींद
करवटों का कहर होगी
रोशनी देगी दस्तक
मगर
वो ना सहर होगी
कभी
घुल जाउँगा
मैं
रात कि शबनम में
और
तुमको ना खबर होगी

Tuesday, August 19, 2014

एक तार चाशनी का अपनी जुबाँ पर रख लूँ


एक तार चाशनी का
अपनी जुबाँ पर रख लूँ
मिठास ज़िन्दगी की
एक बार तो मैं चख़ लूँ

आँखों को बंद करके
मैं रौशनी लूटूं
तेरे इश्क़ में ऐसे
एक बार मैं टूटूं
हर जर्रा मेरे वज़ूद का
तेरे नाम हो जाये
तेरी इबादत तेरी परश्तिश
मेरा काम हो जाये
तू ही मेरे सुबह
मेरी शाम हो जाये
फिर चाहे हर कतरा
बदनाम हो जाये

जो मुझे अदा हो तेरी इनायत
रोज़ा हर दिन हर हाल में रख लूँ
मिठास ज़िन्दगी की
एक बार तो मैं चख़ लूँ

आवारा


एक तिश्नगी
एक ज़ार है
मेरी रूह के हर तार में
हूँ फिर रहा
कब से ना जाने फिर रहा
हश्र के बाज़ार में

विस्ल
हुआ नीलम मुफ़लिस
फ़िराक
तो भी बिक गया
कुफ्र का
फानूस आ कर
क़दमों में मेरे
टिक गया

मस्जिद से हुआ
बेदखल
रुस्वा
मैखाने से
अब क्या मुझे लेना कहो
रक़ाबत भरे जमाने से

है
फिरन अब हमनफ़स
ना मंज़िल
ना रास्ता
ना दीन से उम्मीद कोई
ना दुनिया से कोई वास्ता
है कदम मदहोश
गफलत में दोबारा
क्या फ़र्क़ पढता है
जो कहते हो
आवारा

रात भर करवटें

रात भर
करवटें
धुनता रहा
तेरे रंग के
ख्वाब
बुनता रहा

ना रात सोयी
ना सुबह जागी
उम्मीद के मोती 
चुनता रहा
साँसों में
तुझको
पिरोता रहा
तुझे
धड़कनों में
सुनता रहा

रात भर
करवटें
धुनता रहा
तेरे रंग के
ख्वाब
बुनता रहा

तेरे जाने के बाद कई दिनों तक बरसात रही

तेरे जाने के बाद
कई दिनों तक बरसात रही
लोग कहतें हैं
कि
सूरज निकला
मेरी रूह में बस रात रही
तेरे जाने के बाद
कई दिनों तक बरसात रही

नश्तर चुभोती खलिश कोई 
अब तेरी सौगात रही
अब रहा बाँकी बचा क्या
फ़ुर्क़त ही मेरे साथ रही
मिट गया इत्मामा मेरा
क्या मेरी औकात रही
कुफ्र ने ऐसा दबोचा
ना दीन ना कोई जात रही
तेरे जाने के बाद
कई दिनों तक बरसात रही
लोग कहतें हैं
कि
सूरज निकला
मेरी रूह में बस रात रही

तेरी मुस्कुराहटें ज़िन्दगी की आहटें

तेरी मुस्कुराहटें
ज़िन्दगी की आहटें

मुझ तक
जब भी आती हैं
रौशनी लाती हैं

कभी फूल
कभी सबा बनकर
वज़ूद मेरा महकाती हैं 
बरसती हैं
कभी
घटा बन कर
और मेरी रूह भीगती हैं

कभी खिलती हैं
वसंत बनकर
कभी शरत चंद बन जाती है
सावन भादो बरसे जितना
धूप सुहानी लाती है

कभी पंख
कभी परवाज़ बनकर
आकाश तक ले जाती हैं
थके हुए कदमों में
आकर
कभी
जान फूंक कर जाती हैं

कभी शबनम
कभी मोती बनकर
कभी जुगनू
जगमगाती हैं
मुझ तक
जब भी आती हैं
रौशनी लाती हैं

ज़िन्दगी की आहटें
तेरी मुस्कुराहटें

तुम ही बताओ


तुम ही बताओ
बिना हवा के सांस कैसे आएंगी
लपेट लोगी जो डोर सारी
पतंग कैसे मुस्कुराएगी

बिना पानी के बोलो कैसे
बादल उमड़ कर आएंगे
जो धूप हुई ना थोडी थोडी
कैसे इन्द्रधनुष बन पाएंगे

जो रात हुई ना कैसे जुगनु
राहें जगमग कर पाएंगे
बिन सूरज के डूबे हम
सुबह कहाँ से पाएंगे

आँखें मूंदे मूंदे हम
दूर कहाँ चल पाएँगे
बस उतना ही पहुचेंगे
पैर जहाँ ले जायेंगे

आँखें खोलो
धूप ओढ़ लो
पंखों को फैलाओ
तुम अपनी शिद्दत के दम पर
हवा चीरते जाओ