Tuesday, April 25, 2017

इंतजार

मैं मानता हूँ
कि हवा हमेशा हक में नहीं बहती

कभी कभी
वो जड़ें भी हिला देती है 
और पत्तियाँ भी गिरा देती हैं
मगर दरख़्त भी कहाँ जिद छोड़ते हैं

जब तक मिट्टी साथ देती है
खड़े रहते हैं
बारिश में भीगते
धूप में सूखते
रात के अंधेरों से लड़ते
जब तक मिट्टी साथ देती है

लेकिन जब मिट्टी बह जाती हैं 
और जड़ें नंगी हो जाती हैं ना,
तब पेड़ पेड़ कहाँ रह जाते हैं 

आकाश की तरफ बाँहें फैलाए
अपने तने के वजन के नीचे दरकना
और कयामत का इंतजार करना
आसान नहीं होता है

Monday, April 24, 2017

मेरा क्या है

कहाँ का इश़्क साहब
रंजिशें थी
नहीं तो कौन पीठ पर खंजर उतार के कहता है
मुझे मालूम है
कि तुम जी लोगो

मेरी जिंदगी ना हुई
मशकबीन हो गई
बगल में दबाओ
और सुर में बजाओ

जब तक मल्हार बजे
तब तक हवा का पींगे भरो
और जब विहाग बजे
तो पटक ड़ालो
और उँगलियाँ उठाओ ईख के इमान पर
कि कितने छेद हैं इसमें
कहाँ कहाँ उँगलियाँ रक्खूँ

तकाज़ा है
कि पीठ को यकीन का काबा बना दिया
और उतर जाने दिया खंजर 
रूह तक गहरा
सच कहूँ
तो तुम्हारे चेहरे पर जो इबारत चस्प है ना
एक दिन काफिर बन कर फ़ितना हो जाएगी

मेरा क्या है
दफ्न हो कर भी
साँस ले लुंगा

मैं हूँ

मैं निरपट नंगा
मैं एक ज़िंदा लाश
किसको जाना दूर है
किसको आना पास

मैं अपशिष्ट 
मैें कोढ हूँ तन का
मैं मैला हर उजले मन का
फूल रही जो दमे दमे से
मैं वो उल्झी साँस
किसको जाना दूर है
किसको आना पास

मैं रज:स्राव
मैं स्वपन दोश
मैं बहता पीप मवाद
जिस से भी धबराते हो
मैं हूँ वो अपवाद
बंद गले में हलक में अटके
मैं हूँ एैसी फाँस
किसको जाना दूर है
किसको आना पास

Sunday, April 23, 2017

गोलज्यू का धोड़ा

चित्तई थे पहुँचे,गोलज्यू
लेने लोक अदालत
भूख प्यास से पतली हो गई
थी घोड़े की हालत

जाम कचहरी लगी हुई थी
जम कर वाद विवाद
सोचा घोड़े ने ले ले वो
हरी घास का स्वाद

आस पास की बस्ती में
पहला नौला जो आएगा
वहीं बैठ के पानी पी कर
वो थोड़ा सुस्ताएगा

चार कदम पर चार गाँव है
भरे हुए आबाद
जाम कचहरी लगी हुई थी
जम कर वाद विवाद

पहले गाँव मे नाल टूट गई
ईंटों पर चलते चलते
दूजे में भी भूखा रह गया
पैर वो मलते मलते

गाँव तीसरा जगमग मंजर
फसल सी सरिया, खेत थे बंजर
चौथे में भी लगे थे खंजर
भूख से हिल गए अस्थी पंजर

प्यास में बहका एड़ लगाई
पहुचाँ नदी पनार
खीं खीं कर के खीस निपोरे
थी पानी की धार

देख के नदिया की गुरबत को
घोडा कुछ थर्राया
मेढ़क बोला सोने दे
तू बादल क्यों नहीं लाया

भूखा प्यासा घोड़ा टक टक
चढ़ने लगा पुयाल
फिसल फिसल कर गिरते पड़ते
बुरे हुए थे हाल

जैसे तैसे खींच खाँच कर
लौटा भगवन के धाम
पूछ खिंच कर अर्जी बाँधी
वो पहला था काम

आए गोल्ज्यू तो वो बोला
मुझको न्याय दिलाओ
कहीं बची है हरी घास तो
फिर तुम मुझे हिलाओ

लोह लक्कड़ ईंट के नीचे
दरक रहे पहाड़
कुछ तो भगवान काज करो
फूँक करो या झाड़

अपने गले की मैं ये घंटी
मंदिर में चढ़वाऊंगा
जिस दिन बारिश में भीग भीग कर
चित्तई लौट कर आऊंगा

तुम ठहरे जो कोतवाल
अब करो दूध का पानी
रोपो कुछ एैसा जो ठहरो
पानी और जवानी

Wednesday, April 19, 2017

कहानियाँ

सारी कहानियाँ
एक सी होती हैं
किसी को जमीन नहीं मिलती
तो किसी को आसमान
त्रिशंकु की तरह लटकती रहती हैं 
हलक में
ना उगली जाती हैं
ना निगला जाती हैें
दम अलग धुटता है

आग लगा दो एैसी कहानियों को और राख हो जाने दो

ख्वाब जिंदगी तो नहीं होते

चलो फिर से धूप पर एक कविता लिखते हैं
और
फिर से
अपना दिल बहलाते हैं

फिर से सुबह के रंगों को नज़म बना कर
सूरज के जलाल के कसीदे पढ़ते हैं
और दिन को एक झूठी उम्मीद से हामिल करते हैं

फिर से पलकों पर मुगालतों की पालकियाँ सजाते हैं
और यकीन दिलाते हैं खुद को
एक झूठा यकीन
की जो पूरब से निकला है वो इमान का सूरज है

और
भूल जाते हैं उस रात को
जिसने तब संभाला था
जब दिन पराया हो चला था
और शाम सूदखोर पठान की तरह चौथ वसूलती थी

जिस रात ने
पलको को ख्बाव सजाना सिखाया
उस रात को भूल जाते हैं

ख्वाब जिंदगी तो नहीं होते

Tuesday, April 18, 2017

नाच

चक्कर चक्कर चाल जमूरे
ताल ताल तू नाच
थाली की तू थाप पर छम छम
दुनिया अपनी नाप

किस चेहरे के पीछे छिपकर
मौत खड़ी मुस्काए
कौन घोप दे पीठ पे खंजर
तू जो गले लगाए
आँखों की सीरत है शायद
झूठ को करना साँच
चक्कर चक्कर चाल जमूरे
ताल ताल तू नाच

कौन पराया कौन है अपना
कैसे तू पहचाने
चेहरों पहन पहन कर देखो
रूह लगे है खाने
चल मरघट पर चिलम भरें
सिने में खींचे आँच
चल चक्कर चक्कर झूम जमूरे
ताल ताल तू नाच

लाश है तेरी, अर्थी तेरी
कंधा कौन लगाए
मुर्दा भी एक बात बता तू
काम किसी के आए
मिट्टी के पुतले में लिपटे
कंजर सच है पाँच
चक्कर चक्कर चाल जमूरे
ताल ताल तू नाच

मुझे जला देना

जब आमावस की रात आएगी
मुझे आग में डाल देना
चिड़ की लकड़ी की तरह
मैं धू धू कर के जल उठूंगा
बहुत लीसा भरा है मेरे अंदर
चिपचिपा लिसलिसा लीसा
जो किसी काम का नहीं

आग बहुत देर तक धधकेगी
और लपटे़ं आसमान से बातें करेंगी
आँच भी बहुत तेज होगी
अगर तुम ज्यादा करीब आए
तो झुलस जाओगे
इसीलिए दूर से ही खड़ा हो कर
अपनी दोनों हथेलियाँ खोल कर
आग तापना

हाँ धुआँ भी उठेगा
काला गाढ़ा दम घोटू धुआँ
जो अगर तुम्हारे फेफड़ों में भर गया
तो कलेजा फट जाएगा
इसलिये ध्यान रखना
कि हवा कहाँ की बह रही है
पछुआ हो तो तुम उत्तर में चले जाना
और अपनी नाख को दुपट्टे से ढँक लेना

मेरी राख को मत छेड़ना
बस मिट्टी में दबा देना
और रात की ओस मे भीगने देना
जब सुबह तुम लौट कर आओगे
वहाँ पर एक नागफनी लगा होगा
इतना असवाद भर गया है मेरे अंदर
हस साँस जलील हो कर
कोई कुन्दन कैसे बन सकता है

मेरी मौत से पहले

एक दिन
जब मेरी उँगलियाँ कट जाएंगी
और जुबान को फालिज़ पड़ जाएगा
मैं कविताएं नहीं लिखुंगा

कहीं किसी पागलखाने में बैठ कर
आसमान से बातें करूंगा

बातें जो कोई सुन नहीं सकेगा

तब ना जाने कितनी कविताएं
बेमौत मारी जाएंगी 
और मेरे मन के शमशान में उनका जौहर होगा
जब धू धू करती चिता के धुएँ में
किरदार चित्कार लगाएंगे
मैं दिल खोल कर हंसुगा 

मरो सब

तुमने मुझको कितनी मौतें मारा है

क्यों उम्मीद तोलता हूँ
मैं काफ़िर पैरों से

ख़ुदा शामिल नहीं है
ख़ुदी हामिल नहीं है